बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट से बोली- चुनाव बाद हिंसा के आरोप निराधार, जुर्माना लगाकर खारिज की जाए याचिका

सोमवार, 14 जून 2021, पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा के कारण लोगों के कथित विस्थापन पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका का कड़ा विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में हुई हिंसा के प्रत्येक कृत्य को चुनाव के बाद की हिंसा के रूप में नहीं देखा जा सकता।

हलफनामे में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका राजनीति से प्रेरित है। याचिका विशुद्ध रूप से पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति के संबंध में वास्तविक परिस्थितियों से अदालत को गुमराह करने के लिए दायर की गई है।  हलफनामे में राज्य सरकार ने कहा है कि चुनाव आयोग की देखरेख में हुए चुनाव के बाद सत्ताधारी दल के लोकतांत्रिक रूप से चुने जाने के बाद राज्य में लोकतंत्र की हत्या और फासीवाद व मानवीय संकट आदि जैसे निराधार आरोप लगाना अपमानजनक है। राज्य सरकार ने कहा है कि इस तरह के निराधार आरोप राजनीतिक प्रतिशोध की वजह से लगाए जाते हैं, लिहाजा इस याचिका को जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए।


दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में अरुण मुखर्जी समेत पांच लोगों ने एक याचिका दायर कर पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद होने वाली हिंसा के कारण कथित तौर पर बड़ी संख्या में हो रहे विस्थापन की जांच एसआईटी से कराने की मांग की थी। इस पर गत 25 मई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार समेत अन्य को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। अब इसी नोटिस के जवाब में राज्य सरकार ने हलफनामा दायर कर उक्त सभी बातें कही हैं।


इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार 15 जून को होगी। बहरहाल, याचिका में दावा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद होने वाली हिंसा के कारण राज्य में लोगों का सामूहिक पलायन और आंतरिक विस्थापन हुआ है। पुलिस और 'राज्य प्रायोजित गुंडे' आपस में मिले हुए हैं। यही वजह है कि पुलिस मामलों की जांच नहीं कर रही है और उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है, जो जान का खतरा महसूस कर रहे हैं।  याचिका में कहा गया है कि इस डर और भय की वजह से लोग विस्थापित होने या पलायन करने को मजबूर हैं। वे पश्चिम बंगाल के भीतर और बाहर आश्रय गृहों या शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं। याचिका में एक लाख से अधिक लोग विस्थापन का दावा किया गया है।

 
 
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