पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी का निधन, काशी में ली अंतिम सांस

शनिवार, 22 मई 2021,काशी की पांडित्य परंपरा के वाहक महामहोपाध्याय पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी नहीं रहे। 86 वर्ष की आयु में उन्होंने शुक्रवार की रात वाराणसी के महमनापुरी कॉलोनी स्थित अपने घर में आखिरी सांस ली।


मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के नादनेर गांव में 22 अगस्त 1935 को जन्मे पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी संस्कृत साहित्य के महाकवि, नाटककार और समीक्षक थे। पंडित द्विवेदी ने संस्कृत भाषा में तीन महाकाव्य, 20 खंडकाव्य और दो नाटकों से ज्यादा कृतियों की रचना की थी।


काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में वह 1971 से 1990 तक संस्कृत के प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष और संकाय प्रमुख रहे। उनके महाकाव्य स्वातंत्र्यसम्भवम के लिए उन्हें 1991 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। BHU के इमेरिटस प्रोफेसर रहे पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी को 2017 में मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से राष्ट्रीय कबीर सम्मान से सम्मानित किया गया था। संत कबीर दास की स्मृति में भोपाल में आयोजित सदगुरु कबीर महोत्सव में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें इस सम्मान से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें 1978 में राष्ट्रपति पुरस्कार, 1993 में कल्पवल्ली पुरस्कार, 1997 में वाचस्पति पुरस्कार, 1999 में श्रीवाणी अलंकरण और उत्तर प्रदेश सरकार के वाल्मीकि पुरस्कार जैसे कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।

BHU के सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन प्रो. कौशल किशोर मिश्रा का कहना है कि पंडित जी के निधन से काशी की पांडित्य परंपरा की एक प्रमुख कड़ी टूट गई। 70 के दशक में पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी, संकटमोचन मंदिर के महंत प्रोफेसर वीरभद्र मिश्रा, विद्या निवास मिश्रा, हरिहर नाथ त्रिपाठी, शिव दत्त शर्मा चतुर्वेदी, पं. गोपाल त्रिपाठी, कमलेश दत्त त्रिपाठी, गिरजा शंकर सिंह, बटुक शास्त्री जैसे लोग देश और दुनिया में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और अकादमिक क्षेत्र के काशी के बड़े नाम थे। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ला, ज्योतिषाचार्य डॉ. कामेश्वर उपाध्याय, काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. राम नारायण द्विवेदी आदि ने पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी को श्रद्धांजलि दी है।

 
 
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