कामिनी कौशल बोलीं- देश का बंटवारा देखा, सिनेमा का बदलता रूप देखा, 94 की उम्र में कहना चाहती हूं अपनी कहानी

 फिल्मों में अभी तक सक्रिय कलाकारों में सबसे उम्रदराज कामिनी कौशल के 94वें जन्मदिन पर दैनिक भास्कर उनके घर पहुंचा। इस दौरान एक्ट्रेस ने अपनी दिनचर्या  के बारे में बताया। उन्होंने बंटवारे से जुड़ी यादें शेयर की और कहा कि अब वे अपनी कहानी दुनिया के सामने बयां करना चाहती हैं। कामिनी की कहानी उन्हीं की जुबानीमैं 94वें साल में प्रवेश कर रही हूं, पर आज भी काम करती हूं। घर पर होती हूं तो पेंटिंग करती हूं। पपेट्स बनाती हूं। अभी मेरी दिनचर्या ऐसी है कि मैं सुबह 7:00 बजे उठने के बाद अपना ज्यादातर काम खुद ही करती हूं। अखबार पढ़ने के बाद कुछ लिखती हूं। मॉर्निंग में ड्रॉइंग वगैरह अच्छी होती है क्योंकि फ्रेश मूड होता है। मुझे आज भी लोग काम के लिए पहचानते हैं। ये देखिए अभी ही फिल्म में काम के लिए फोन आया है (उस समय एक प्रोड्यूसर ने फोन कर एक रोल का अनुरोध किया था)।  हाल ही में फिल्म "कबीर सिंह' में काम किया था। एक शॉट दिया जो एक टेक में ही हो गया। कोई रीटेक नहीं। कई दफा बोर हो जाती हूं। कुछ अलग करने का मन करता है। यह सब इतने खिलौने रखे हैं, ये सब मेरे हाथ से बने हैं। यह बनाने में मुझे उतना ही संतोष मिलता है जितना मुझे फिल्म मेंं काम करने में मिलता है। तो मेरे लिए क्रिएटिविटी इंपॉर्टेंट है, न कि यह किसी काम के लिए मिले पैसे।फिल्मों से ब्रेक लेकर 5 से 10 साल तक पपेटिंग की। इसके लिए मुझे कई अवॉर्ड मिले। मैं खुद कहानियां लिखा करती थी। इन कहानियों के ऊपर मैंने सीरियल भी बनाया है। मैंने अपने बेटे बंटू के नाम पर कई कविताएं लिखी हैं। बच्चों के लिए एक वर्णमाला भी लिखी है। मेरे दिमाग में आधी रात को भी कोई आइडिया जाता था तो जाकर लिख लेती थी। मुझे गाने डांस, साइकलिंग, कढ़ाई-बुनाई, स्विमिंग सब कुछ आती थी। मेरे पास अभी तक बचपन की बनाई चीजें हैं। गुड़िया-गुड्डा बनाकर उनकी शादी कराती थी। बैडमिंटन खेलती थी।आज मेरा जन्मदिन है। पहले तो मेरा बर्थडे बहुत नाइसली मनाया जाता था। यह हमारे घर का ट्रेडिशन है कि बच्चों के जन्मदिन पर रात को ही सारे गिफ्ट सजा कर इधर-उधर लटका देते थे। मेरा गिफ्ट पैक करके मेरे बेड के आसपास या कमरे में रख देते थे। तरह-तरह के खिलौने और क्राफ्टवर्क की चीजें मिलती थीं। अब बर्थडे मनाने का कुछ खास प्लान तो नहीं करती हूं, क्योंकि मेरी उम्र के मेरे ज्यादातर फ्रैंड्स इस दुनिया में नहीं रहे।इस इंडस्ट्री में सब मेरे लिए एक फन की तरह रहा। मैंने कभी इसे अपना कॅरिअर बनाने के बारे में नहीं सोचा। मैंने काम करना तभी शुरू किया जब मेरी शादी होकर मैं मुंबई आ गई थी। इससे पहले मैं लाहौर में थी। वहां मैंने मुश्किल से पांच हिंदी फिल्में देखी होंगी। मेरी शादी मेरे ब्रदर इन लॉ से ही हुई है। मेरी सिस्टर की एक कार एक्सीडेंट में डेथ हो गई थी। उनसे मैं बहुत अटैच्ड थी। उनको दो छोटी बच्चियां थी। मेरी बहन के जाने के बाद मैंने उनकी जिंदगी में आकर इन सभी को संभाला। मेरे हस्बैंड बहुत सपोर्टिव थे। उन्होंने हर टाइम मेरा साथ दिया। यह सब उनकी वजह से ही कर पाई।लाहौर की यादेंलाहौर में मेरा स्वर्ग सा घर था। घर के चारों तरफ पेड़ थे। उसके बाद खट्टे की बाढ़ बनी थी। पूरे घर पर बहुत हरियाली थी। पार्टीशन के बाद भी अपना घर देखने जाती थी। फिर तो पाकिस्तानियों ने वह सड़क ही खत्म कर दी जिसके ऊपर हमारा घर होता था। वहां पर एक शॉपिंग मॉल बना दिया। वहां की यादें अभी भी ताजा हैं। मेरे पापा श्रीराम कश्यप वर्ल्ड फेमस साइंटिस्ट थे। उनकी किताबें आज भी पढ़ी जाती है। मैं पांच वर्ष की थीं, जब मेरी आंखों के सामने उनका देहांत हुआ। हम पांच भाई-बहन थे। दो भाई और तीन बहनों में मैं सबसे छोटी थी। मम्मी ने हम सबको संभाला। लाहौर में वह गवर्नमेंट कॉलेज अभी भी है, जहां पर मेरे पिताजी काम करते थे। बंटवारे के बाद पाकिस्तान तीन-चार बार गई। वहां पर मेरे पिताजी बहुत बड़े सम्मानित आदमी थे।मेरी फैमिली इतनी प्रोग्रेसिव थी कि किसी भी क्रिएटिव चीज को वहां ना नहीं कहा जाता था। मेरे भाई डॉक्यूमेंट्रीज अपने हाथों से बनाया करते थे। रिकॉर्डर से लेकर प्रिंटेड, एडिटिंग, टाइटल म्यूजिक सब कुछ करते थे। जब मैं सात या 8 साल की रही होंगी, तब उनकी फिल्म द ट्रेजडी में काम किया। मैं रेडियोज पर बहुत प्ले किया करती थी। जहां पर भी प्ले होते थे मैं साइकिल उठा कर चली जाती थी। स्कूल तो पास में ही था वहां पैदल जाती थी। कॉलेज में भी शेक्सपियर से लेकर काफी प्लेज किया।ऐसे हुई शुरुआतचेतन आनंद मेरे भाई के बहुत गहरे दोस्त थे। वह एक फिल्म बना रहे थे। उस समय मैं कॉलेज में लास्ट ईयर में थी। उन्होंने जब मुझसे पूछा, तो मैंने मना किया, पर भाई ने मुझे आखिर मना ही लिया। जैसे-तैसे ‘नीचा नगर’ में काम करने तैयार हुई। यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल में गई जहां इसे टॉप का अवॉर्ड मिला। यह पिक्चर हम बच्चों ने बनाई थी। हमारे पास सुलझे और मंझे हुए डायरेक्टर, कैमरामैन नहीं थे। मुझे याद है इसकी शूटिंग के लिए मैं लाहौर से मुंबई आई थी। फिल्म जिस दिन खत्म हुई उसी दिन मैं घर वापस चली गई।पति के कहने पर ओके किया सीन‘नदिया के पार’ में मुझे साड़ी ऐसे पहननी थी, जिसमें ब्लाउज नहीं पहनते हैं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। हस्बैंड से कहा कि आप सेट पर आकर देखिए, यह बल्गर तो नहीं लगता। वे आए तो बोले कि मैं तो इसमें क्यूट लग रही हूं। उनके कहने पर ही मैंने वह सीन किया। आजकल शरीर का दिखावा ज्यादा हो गया है। मुझे यह पसंद नहीं है।मैंने कभी किसी से रोल नहीं मांगा। साथी कलाकार अभि भट्टाचार्य ने एक बार कहा कि- ‘कामिनी, तुम बिमल राय के पास चली जाओ। उनके पास एक बड़ा रोल है।’ आखिर कौन बिमल दा के साथ काम करना नहीं चाहेगा? लेकिन मेरी आदत है कि मैं रोल मांगने नहीं जाती। मैं उनके पास गई ही नहीं और एक दिन बिमल दा का सामने से मुझे बुलाने कॉल आया। मैंने उसमें काम किया और उसके लिए हमें फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।टब जितना भर-भर के खत आते थेबर्थडे पर अमिताभ फूल भेजते हैं। उनकी मां मेरी बड़ी बहन के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। फिल्म इंस्टीट्यूट के लिए जया भादुड़ी को मैंने ही सिलेक्ट किया था। उन्होंने जब फाइनल टेस्ट दिया था। तब भी मैं वहां पर थी।मेरे दाएं पांव की यह टेढ़ी अंगुली फिल्मों की देन है। उपकार फिल्म के लिए खारघर स्टूडियो में शूटिंग कर रही थी, तभी मदन पुरी के हाथ से मेरे पांव पर बॉक्स गिरा। फिर यह उंगली टूट ही गई।मेरे फैंस बाथ टब जितना भर-भर के चिट्ठी भेजते थे। इनको पढ़ने मैंने सेक्रेटरी रखी हुई थी। फैंस को वह थैंक्स लिखकर भेजती थी। अभी भी बहुत से ऐसे फैंस मिल जाते हैं जो कहते हैं कि आपका खत हमने अभी भी संभालकर रखा है।अभी ऐसी है दिनचर्यासुबह नाश्ते में पपीता, तरबूज, केला जैसे फ्रूट्स के साथ एक गिलास दूध पीती हूं। कभी-कभार आधा टोस्ट खा लेती हूं। दोपहर डेढ़-दो बजे लंच करती हूं। लंच में दाल, चावल, चपाती वगैरह खाती हूं या फिर कोई नॉन वेजिटेरियन डिश खाती हूं। शाम को चाय पीती हूं। रात का भोजन हल्का ही करती हूं। उसमें बहुत ज्यादा मसाला वगैरह पसंद नहीं करती हूं। पराठा, रोटी-चावल, कभी वेज डिश तो कभी फ्राई फिश या उबला हुआ कुछ लेती हूं। हम यह देखकर हैरान रह गए कि कामिनी जी आज भी हर किस्म की क्रिएटीविटी में सक्रिय हैं, दिन भर पेटिंग, टॉय मेकिंग, पपेट्स मेकिंग, राइटिंग, म्यूजिक लिसनिंग जैसे कुछ न कुछ रचनात्मक काम करती ही रहती हैं। उनसे लगातार चार घंटे चर्चा हुई और इस बीच में उन्होंने करवट तक नहीं बदली। बीपी, शुगर से से उनका दूर तक का नाता नहीं है। थकावट के निशान तो उनके चेहरे पर देखे भी नहीं जा सकते। यहां तक कि चर्चा खत्म होने के बाद वह छड़ी लेकर मुझे खुद गेट तक छोड़ने आईं।

 
 
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